गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

कुमाऊं विवि के भौतिकी विभाग को "सेंटर फॉर एक्सीलेंस"



यूजीसी से मिलेंगे 1.37 करोड़ रुपये सेंटर फार एडवांस्ड स्टडीज बनेगा
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर का भौतिकी विभाग पुन: अपने गौरव की ओर लौटता नजर आ रहा है। विभाग को विवि अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने ˜सेंटर फॉर एक्सीलेंस" बनाने की घोषणा कर दी है। इसके तहत विभाग को अगले पांच वर्षो में 1.31 करोड़ रुपये मिलेंगे, जिससे विभाग को सीएएस यानी सेंटर फॉर एडवांस स्टडीज यानी डीएसए के रूप में विकसित किया जाएगा। इस धनराशि से विभाग में स्नातकोत्तर व शोध के स्तर को बढ़ावा देने के लिए अत्याधुनिक उपकरण खरीदे जाएंगे, साथ ही विभाग से संबंधित बड़ी संगोष्ठियां व लेक्चर भी आयोजित किए जाएंगे। उल्लेखनीय है कि कुमाऊं विवि के भौतिकी विज्ञान विभाग के प्रो. डीडी पंत को कुमाऊं विवि के प्रथम कुलपति होने का सौभाग्य मिला था। प्रो. पंत की गिनती देश के बड़े वैज्ञानिकों में होती थी। इस लिहाज से विवि के भौतिकी विभाग का गौरवमयी इतिहास रहा है। इधर, बीते माह 21-22 जनवरी को यूजीसी की बैठक में भौतिकी विभागाध्यक्ष डा. संजय पंत द्वारा किए गए विभाग के प्रस्तुतीकरण के फलस्वरूप यह उपलब्धि हासिल हुई है। प्रो. पंत ने उम्मीद जताई कि इस उपलब्धि के बाद विभाग में पढ़ाई व शोध का स्तर बढ़ेगा। बताया कि विभाग को डीआरएस व डीएसए के बाद मिली यह तीसरी अवस्था है। वहीं कुलपति प्रो. राकेश भट्नागर ने विभाग की इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए कहा कि इससे विभाग में काफी सारे अत्याधुनिक उपकरण प्राप्त होंगे। फलस्वरूप विद्यार्थी बेहतर सुविधाओं के साथ शोध कार्य कर पाएंगे, साथ ही उनके कार्य को देश-दुनिया में महत्व मिलेगा। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व विवि के भूगर्भ विज्ञान विभाग को ही यूजीसी से "सेंटर फार एक्सीलेंस" का पुरस्कार मिल पाया है।

प्रो. पंत ने अपने उपकरणों से की थी स्थापना
नैनीताल। कम ही लोग जानते होंगे कि डीएसबी परिसर की भौतिकी प्रयोगशाला देश की ऐसी पहली प्रयोगशाला है, जो प्रो. डीडी पंत ने अपने बनाए उपकरणों से 1954 से 1956 के बीच स्थापित की थी। आज भी यह प्रयोगशाला देश की श्रेष्ठ प्रयोगशालाओं में गिनी जाती है, और खासकर प्रकाश-भौतिकी (स्पेक्ट्रोस्कोपी) की प्रयोगशालाओं के मामले में उत्तर भारत की सर्वश्रेष्ठ प्रयोगशाला बताई जाती है।

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

मर के भी देखा जा सकेगा देश का आखिरी साइबेरियन टाइगर



टैक्सीडर्मी के रूप में नैनीताल जू लौटा कुणाल

नैनीताल (एसएनबी)। नैनीताल चिड़ियाघर में 19 नवम्बर 2011 को दुनिया से विदा हो चुके देश के आखिरी कुणाल नाम के साइबेरियन टाइगर को अब फिर देखा जा सकेगा। मंगलवार को मंडलायुक्त डा. हेमलता ढौंडियाल ने कुणाल का टैक्सीडर्मी ट्रॉफी के रूप में अनावरण किया। मंडलायुक्त ने इस दौरान कहा कि इस ट्राफी को शीघ्र चिड़ियाघर के संग्रहालय में आमजन के लिए प्रदर्शित किया जाए। साथ ही इसके साहित्य को चिड़ियाघर की वेबसाइट पर अपलोड किया जाए। नैनीताल जू में कुणाल की टैक्सीडर्मी ट्राफी के अनावरण के मौके पर निदेशक डा. पराग मधुकर धकाते ने बताया कि मुंबई के संजय गांधी नेशनल पार्क बोरीवली के टैक्सीडर्मिस्ट डा.संतोष गायकवाड़ ने कुणाल की वैज्ञानिक तरीके से हूबहू प्रतिकृति तैयार की है। यह वैज्ञानिक व शैक्षिक अध्ययन के साथ ही जू में आने वाले सैलानियों के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि फरवरी में कुणाल को पूर्व में तैयार स्नो लैर्पड-रानी की टैक्सीडर्मी के साथ स्थापित किए जा रहे संग्रहालय में आमजन के रखा जाएगा। इस दौरान जनपद के दूरस्थ बेतालघाट ब्लाक के राउमावि गरजौली की छात्राओं ने पहली बार किसी चिड़ियाघर की सैर के साथ ही ऐसे ऐतिहासिक क्षणों में उपस्थिति का अनुभव लिया। उन्होंने उपस्थित अतिथियों के स्वागत में गीत भी प्रस्तुत किया। इस मौके पर प्रशिक्षु आईएफएस डा. कोको, जू के चिकित्सक डा. एलके सनवाल, वन क्षेत्राधिकारी प्रकाश जोशी, केसी सुयाल व अतुल भगत के साथ गरजौली के शिक्षक जगदीश चुफाल व जया बाफिला आदि भी मौजूद रहे। संचालन मनोज साह ने किया।

दुनिया का दूसरा टैक्सीडर्मी रूप में संरक्षित साइबेरियन टाइगर बना कुणाल

नैनीताल। मंगलवार को टैक्सीडर्मी के रूप में मरने के बाद भी संरक्षित किया गया कुणाल दुनिया का दूसरा साइबेरियन टाइगर है। डा. धकाते ने बताया कि इससे पूर्व चीन में मार्च-11 में एक साइबेरियन टाइगर की टैक्सीडर्मी बन चुकी है। उल्लेखनीय है कि दुनिया में टाइगर यानी बाघ की तीन प्रजातियां विलुप्त हो चुकी है, और केवल पांच बची हैं। चीन व रूस में प्राकृतिक वास स्थल के रूप मैं पाया जाने वाला साइबेरियन टाइगर दुनिया का सबसे बढ़ा बाघ होता है। भारत का रॉयल बंगाल टाइगर दुनिया का आकार के लिहाज  से दूसरा सबसे बढ़ा बाघ है। नैनीताल जू में मौजूद कुणाल दार्जिलिंग जू में 26 अप्रेल 194 को पैदा हुआ था। चूंकि इसकी प्रजाति लुप्राय श्रेणी में है, लिाजा इसका मर के भीदिखते रहना वन्य जीव संरक्षण के लिहांज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

पांच दिन छोटी पर पांच हजार रुपये महंगी हुई कैलाश यात्रा




इस बार एक नहीं, 12 जून से शुरू होगी यात्रा
गत वर्षो के मुकाबले दो दल अधिक जाने के बावजूद एक माह कम अवधि में निपट जाएगी यात्रा
नवीन जोशी नैनीताल। विश्व भर में अनूठी धार्मिक यात्राओं में शुमार कैलाश मानसरोवर यात्रा इस बार गत वर्षो के मुकाबले पांच दिन कम अवधि में पूरी कर ली जाएगी। यात्रियों को कुमाऊं मंडल विकास निगम को ही पांच हजार रुपये अधिक देने होंगे। यात्रा में पिछले वर्ष ही जुड़ा चौकोड़ी रात्रि पड़ाव इस बार हटा दिया गया है, वहीं चीन में इस बार विगत वर्षो के मुकाबले चार दिन कम बिताने को मिलेंगे। इस वर्ष यात्रा परंपरागत एक जून के बजाय 12 जून से प्रारंभ होगी। यात्रा में गत वर्षो से दो अधिक यानी 18 दल जाएंगे। यात्रा पहले के मुकाबले करीब एक माह पहले ही नौ सितम्बर को पूरी हो जाएगी। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी यात्रा के संभावित कार्यक्रम में यह बातें ध्यान आकषिर्त करतीं हैं। बीते वर्षो में यात्रा से केएमवीएन को प्रति यात्री 27 हजार रुपये मिलते थे, इस वर्ष 32 हजार मिलेंगे। पिछले वर्ष तक यात्रा एक जून से प्रारंभ होती थी, यानी पहला दल एक जून को दिल्ली से अल्मोड़ा पहुंचता था, इस बार ऐसा 12 जून को होगा। पहला दल 27 को वापस दिल्ली पहुंचता था, इस बार केवल 22 दिनों में ही अल्मोड़ा, धारचूला, सिरखा, गाला, बुदी, गुंजी (दो दिन- मेडिकल के लिए), नाभीढांग, तकलाकोट (दो दिन-चीन की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए), चीन में दारचेन, जुनजुई पू, कुगू (दो दिन), वापस तकलाकोट, गुंजी, बुदी, गाला, धारचूला व जागेर में रात्रि पड़ावों के साथ तीन जुलाई को वापस दिल्ली पहुंच जाएगा। इस बार पहली बार 18 दल जाएंगे। आखिरी दल 16 अगस्त को दिल्ली से चलेगा और नौ सितम्बर को लौट जाएगा।
केंद्र ने बंद की सब्सिडी
केएमवीएन हालांकि कैलाश-मानसरोवर यात्रा को लाभ के लिए आयोजित नहीं करता। बावजूद बिना लाभ के भी उसने इस वर्ष प्रति यात्री पांच हजार रुपये शुल्क बढ़ाए जाने की मांग भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से की थी। विदेश मंत्रालय ने शुल्क तो पांच हजार बढ़ा दिया है। इस प्रकार यात्रियों की जेब से तो निगम के लिए अतिरिक्त पांच हजार रुपये निकलेंगे। भारत सरकार ने निगम को बीते वर्षो तक सामान्यतया सब्सिडी कहे जाने वाले प्रति यात्री 3,250 निगम को देने बंद कर दिये हैं। इस प्रकार निगम को इस वर्ष किराया पांच हजार बढ़ने के बावजूद केवल 1,750 ही प्रति यात्री अधिक मिलेंगे। निगम के एमडी दीपक रावत ने बताया कि वर्ष 2010-11 तक विकास शुल्क के रूप में यह राशि मिलती थी। पिछले वर्ष से यह राशि देने से मना कर दिया गया है।

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

जानलेवा बीमारी का टीका बना दिव्या ने हासिल किया अंतराष्ट्रीय युवा वैज्ञानिक पुरस्कार


गायों से मानव में होने वाली व जैविक हथियार के रूप में प्रयोग किए जाने वाले विषाणु की प्रतिरोधक वैक्सीन बनाने में हासिल की सफलता
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि की छात्रा रही दिव्या गोयल को शंघाई में अंतराष्ट्रीय युवा वैज्ञानिक पुरस्कार से नवाजा गया है। यह पुरस्कार चेचक के टीके के जनक एडर्वड जेनर के नाम पर दिया जाता है। दिव्या की खोज इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि उनके बनाए टीके को जैविक हथियारों के विरुद्ध भारतीय सैनिकों में प्रतिरोधक वैक्सीन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। दिव्या ने गायों से मनुष्य में आ सकने वाली जानलेवा ब्रूसलोसिस बीमारी की रोकथाम का टीका विकसित कर और उसका चूहों में सफल परीक्षण कर यह पुरस्कार दुनियाभर के 175 प्रतिभागियों के बीच आयोजित प्रतियोगिता के जरिए "एडर्वड जेनर इंटरनेशनल यंग साइंटिस्ट अवार्ड-२०१२" हासिल किया है। 
मूलत: दिल्ली निवासी दिव्या ने दिल्ली विवि से बीएससी करने के बाद कुमाऊं विवि के जैव प्रौद्योगिकी विभाग से विभागाध्यक्ष डा. बीना पांडे के निर्देशन में वर्ष 2005 से 2007 के बीच एमएससी की डिग्री हासिल की है। यहां से वह वापस दिल्ली गई और संयोग से कुमाऊं विवि के वर्तमान कुलपति डा. राकेश भटनागर के अधीन ही जवाहर लाल नेहरू विवि से शोध कर उन्हें बीती 31 दिसम्बर को पीएचडी अवार्ड हुई है। उसका यह शोध दुनिया की जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में श्रेष्ठतम "मॉलीक्यूलर इम्यूनोलॉजी" व "वैक्सीन" जैसे शोध जर्नल्स में भी प्रकाशित हो चुका है। डा. भटनागर के निर्देशन में उनकी प्रयोगशाला में शोध करते हुए दिव्या ने कमोबेश एडर्वड जेनर द्वारा चेचक का टीका विकसित करने की विधि से ही जेनेटिक इंजीनियरिंग की प्रविधियों का इस्तेमाल करते हुए ब्रूसलोसिस की बीमारी का टीका विकसित किया है। इस टीके का चूहों में सफल परीक्षण भी कर लिया गया है। विदित हो कि एडर्वड जेनर ने गायों की चेचक की बीमारी काउपॉक्स से ही मनुष्य की स्माल पॉक्स यानी छोटी माता का टीका विकसित किया था। डा. भटनागर के अनुसार ब्रूसलोसिस बीमारी के कारण गायों का गर्भपात हो जाता है, जबकि इस रोग से ग्रसित गायों का कच्चा (बिना उबला) दूध पीने से इस बीमारी के विषाणु मनुष्य में भी आ जाते हैं और जानलेवा साबित होते हैं। पंजाब जैसे राज्यों में जहां शरीर को मजबूत बनाने के लिए युवा गाय का कच्चा दूध ही पीने का शौक रखते हैं, यह बीमारी बेहद खतरनाक साबित होती है। वहीं सैनिकों एवं दूसरे देश के लोगों के विरुद्ध इस बीमारी के विषाणुओं को ˜बायोलॉजिकल वारफेयर एजेंट" यानी जैविक हथियार के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है। लिहाजा, चूहों के बाद बंदरों से होते हुए यदि मनुष्य में भी दिव्या द्वारा बनाए टीके के प्रयोग सफल रहते हैं तो देश की सीमाओं पर कार्यरत सैनिकों को इसके टीके लगाकर उन्हें इस जानलेवा रोग से प्रतिरोधी बनाया जा सकता है। बृहस्पतिवार को दिव्या मुख्यालय में आई थीं। उन्होंने यहां कुमाऊं विवि के कुलपति व अपने शोध गुरु डा. राकेश भटनागर तथा भीमताल में जैव प्रोद्योगिकी विभागाध्यक्ष डा. बीना पांडे से मुलाकात कीं एवं आशीर्वाद लिया। उन्होंने बताया कि वह इसी दिशा में अपने शोध को आगे बढ़ाने के लिए विदेश जाना और वापस लौटकर देश की सेवा करना चाहती है। उम्मीद जताई कि उसके द्वारा विकसित टीका देश के काम आ सकेगा।

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

देश में पहुंची एशिया की दूसरी सबसे बड़ी दूरबीन, देवस्थल में होगी स्थापित


नैनीताल के देवस्थल में स्थापित होगी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन गुजरात के मुन्द्रा बंदरगाह से दिल्ली के लिए रवाना
नवीन जोशी नैनीताल। दुनिया की आधुनिकतम तकनीक के साथ देश ही नहीं एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन भारत पहुंच गई है। गुजरात के मशहूर मुन्द्रा बंदरगाह पर उतरकर यह राजधानी दिल्ली के लिए रवाना कर दी गई है। आगे इसे नैनीताल जनपद के देवस्थल में स्थापित किया जाना है। देवस्थल के प्रदूषणमुक्त स्वच्छ वायुमंडल में 120 करोड़ रुपये लागत से स्थापित की जा रही इस दूरबीन से रात्रि में सुदूर अंतरिक्ष में जगमगाने वाले सितारों व अपनी "मिल्की-वे" के साथ ही आस-पास की अनेक आकाशगंगाओं को देखा एवं उनका सूक्ष्म अध्ययन भी किया जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि एशिया में गत वर्ष ही चीन में एक चार मीटर व्यास की दूरबीन लग चुकी है, बावजूद देवस्थल में लगने जा रही दूरबीन कई मायनों में एशिया की सर्वश्रेष्ठ दूरबीन ही कहलाई जाएगी। एरीज के निदेशक प्रो. रामसागर के अनुसार 3.6 मीटर व्यास और 22 मीटर ऊंची दुनिया की आधुनिकतम एक्टिव आप्टिक्स तकनीक पर बनी इस स्टेलर दूरबीन का शीशा केवल 16.5 सेमी. ही मोटा है। इस प्रकार यह मोटाई और व्यास के अनुपात (व्यास व मोटाई में 10 का अनुपात) में दुनिया में अद्वितीय बताई जा रही है। चीन में लगी दूरबीन कई टुकड़ों (मोजैक) को जोड़कर बनाई गई है। इस दूरबीन के ब्लैंक का निर्माण जर्मनी में और शीशे का निर्माण मास्को (रूस) में हुआ है। यहां से इसे बेल्जियम ले जाकर वहां इसका फैक्टरी टेस्ट किया गया। यह इतनी विशालकाय है कि इसे सफल परीक्षणों के उपरांत खोलने में ही जून से अक्टूबर 2012 तक पांच माह का समय लग गया। इसके बाद नवम्बर में यह भारत के लिए रवाना की गई और बीते माह 15 दिसम्बर के करीब मुन्द्रा बंदरगाह पहुंची। वहां से कस्टम की औपचारिकताओं के बाद इसके करीब 5.6 मीटर लंबे, 5.3 मीटर चौड़े व 1.2 मीटर ऊंचे करीब 13 व 12 टन भारी 18 विशालकाय क्रेट्स (डिब्बों) में 12 ट्रेलरों पर दिल्ली लाया जा रहा है। दिल्ली से आगे हल्द्वानी और आगे पहाड़ पर इसे पहुंचाने का रास्ता और भी कठिन है, लिहाजा मई तक इसके देवस्थल पहुंचने और इस वर्ष अक्टूबर माह तक इससे प्रारंभिक प्रेक्षण किए जाने की संभावना है। प्रो. रामसागर के अनुसार इस दूरबीन से तारों के वर्णक्रम का अध्ययन किया जा सकेगा। दूरबीन के शीशे (मिरर) का निर्माण मास्को की एलजोज नामक कंपनी ने किया है। 

इस समाचार को मूलतः यहाँ क्लिक कर 'राष्ट्रीय सहारा' के 5 जनवरी के अंक में प्रथम पेज पर भी देख सकते हैं।

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

"स्टीपी" पर डोला डोल्मा का मन

नैनीताल में प्रवासी पक्षियों के साथ ही देश-विदेश से आए पक्षी प्रेमियों का भी लगा जमावड़ा
नवीन जोशी नैनीताल। जी हां, इश्क हो तो एसा। कजाकिस्तान से प्रवासी पक्षी 'स्टीपी' यानी स्टीपी ईगल अपने शीतकालीन प्रवास पर "पक्षियों के तीर्थ" कहे जाने वाले नैनीताल क्या आया, मानों उसकी प्रेमिका की तरह ही मंगोलिया से पक्षी प्रेमी छायाकार डोल्मा अपने जैसे ही पक्षी प्रेमियों के करीब डेढ़ दर्जन सदस्यों के दल का साथ लेकर यहां धमक आईं। 
डोल्मा बीते तीन दिनों से भरतपुर (राजस्थान) के पक्षी विशेषज्ञ बच्चू सिंह के साथ शहर में है और यहां कूड़ा खड्ड के पास अपने दल-बल के साथ सैकड़ों की संख्या में स्टीपी ईगल की खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद करती जा रही है। मानव प्रेमियों के साथ ही पक्षियों और उनके प्रेमियों के मिलन स्थल बने नैनीताल में ऐसे और भी नजारे इन दिनों आम बने हुए हैं। गौरतलब है कि मनुष्य जिस तरह अपने जीवन में एक बार जरूर अपने धार्मिक तीथरे की यात्रा करना अपने जीवन का उद्देश्य मानता है, कुछ इसी तरह कहा जाता है कि दुनिया भर के प्रवासी प्रकृति के पक्षी भी जीवन में एक बार नैनीताल जरूर जाना चाहते हैं। इस आधार पर भरतपुर पक्षी विहार के सुप्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ बच्चू सिंह नैनीताल को पक्षियों के तीर्थ की संज्ञा देने में संकोच नहीं करते। वह बताते हैं कि देश भर में पाई जाने वाली 1100 पक्षी प्रजातियों में से 600 तो यहां प्राकृतिक रूप से हमेशा मिलती हैं, जबकि देश में प्रवास पर आने वाली 400 में से 200 से अधिक विदेशी पक्षी प्रजातियां भी यहां आती हैं। इनमें ग्रे हैरोन, शोवलर, पिनटेल, पोर्चड, मलार्ड, गागेनी टेल, रूफस सिबिया, बारटेल ट्री क्रीपर, चेसनेट टेल मिल्ला, 20 प्रकार की बतखें, तीन प्रकार के सारस, स्टीपी ईगल, अबाबील आदि भी प्रमुख हैं। बच्चू नैनीताल की इसी खासियत के कारण हर वर्ष खासकर मंगोलिया, कोरिया जैसे दक्षिण एशियाई देशों के पक्षी प्रेमी छायाकारों के दल को नैनीताल लेकर आते हैं। इस बार वह मंगोलिया के दल को यहां के सप्ताह भर के टूर पर लेकर आये हैं। तीन दिनों से उनका करीब डेढ़ दर्जन सदस्यों का दल नगर के हल्द्वानी रोड स्थित कूड़ा खड्ड-हनुमानगढ़ी क्षेत्र में जमा हुआ है। बच्चू कहते हैं कि नैनीताल का सबसे बुरा- शहरभर का कूड़ा डालने वाला स्थान कजाकिस्तान के स्टीपी ईगल की सबसे पसंदीदा जगह है। रानीखेत और अल्मोड़ा भी स्टीपी को काफी पसंद हैं। इस दौरान यहां आये दल को अनेक प्रकार की जमीन पर फुदकने वाली चिड़िया-वाइट थ्राटेड लाफिंग थ्रस, स्ट्राइटेड लाफिंग स्ट्रीट थ्रस, चेस नेट वैली रॉक थ्रस, ब्लेक ईगल, टोनी ईगल, फेल्कुनेट, कॉमन कैसटल व पैराग्रीन फैल्कन सरीखी अनेक पक्षी प्रजातियों के चित्र लेने का लाभ भी मिला है। डोल्मा के साथ निमा, दावा, मिगमार, ल्हाग्बा, बाड्मा, सांग्जई यहां आकर बहुत खुश हैं।
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गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

न्यूनतम निविदा पर नहीं मिलेगा ठेका!


केएमवीएन ने गैस की होम डिलीवरी की ठेका व्यवस्था में किया परिवर्तन 
तय व्यावहारिक दर तीन रुपये से कम की निविदा होगी अस्वीकार 
"राष्ट्रीय सहारा" में छपी थी "एक पैसे पर आई निविदा" की खबर

नवीन जोशी नैनीताल। सामान्यतया किसी भी ठेके को प्राप्त करने के लिए सबसे कम धनराशि की निविदा देने एवं किसी वस्तु की नीलामी में सबसे बड़ी बोली बोलने की शर्त होती है, लेकिन कुमाऊं मंडल विकास निगम से घरेलू गैस की होम डिलीवरी का ठेका लेने के लिए अब पूरी तरह इस शर्त का पालन करना पर्याप्त नहीं होगा। वरन, अब निविदादाता को न्यूनतम तीन रुपये की तय व्यावहारिक दर से अधिक प्रति सिलेंडर की दर पर ही आवेदन करना होगा। इससे कम धनराशि की निविदा को अस्वीकार कर दिया जाएगा। गौरतलब है कि गैस की होम डिलीवरी का ठेका हासिल करने के लिए ठेकेदारों में होड़ मची रहती है। इसी कारण गत दिनों निविदादाताओं ने रुद्रपुर में एक पैसा प्रति सिलेंडर, किच्छा में 10 पैसे प्रति सिलेंडर एवं बाजपुर में 25 पैसे प्रति सिलेंडर जैसी न्यूनतम धनराशि की निविदाएं आई थीं, जिन्हें निगम ने व्यावहारिक दर न मानते हुए अस्वीकार कर दिया है। उल्लेखनीय है कि केएमवीएन इंडियन ऑयल की कुमाऊं मंडल में घरेलू गैस की वितरण एजेंसी है। उसे होम डिलीवरी के लिए प्रति सिलेंडर 15 रुपये मिलते हैं। इस कार्य को निगम स्वयं करने के बजाय कुमाऊं में 29 एजेंसियों पर ठेकेदारों से कराता है। यूं तो न्यूनतम दर की निविदा पर ठेका देना निगम के लिए फायदे का सौदा है, लेकिन देखने में आता है कि ठेकेदार ठेका हासिल करने के लिए तो एक पैसा प्रति सिलेंडर जैसी अव्यावहारिक दरों पर ठेका हासिल करने का प्रयास करते हैं, किंतु बाद में होम डिलीवरी करने में आनाकानी करते हैं। गैस की ब्लैक मार्केटिंग के आरोप भी उन पर लगते रहते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए पूर्व में निगम के तत्कालीन एमडी चंद्रेश यादव ने भी प्रयास किये थे, जो सफल नहीं हो पाये। इधर वर्तमान एमडी दीपक रावत ने निगम के निदेशक मंडल को साथ लेकर न्यूनतम व्यावहारिक दरें तय करने के लिए निगम के जीएम, उप श्रम आयुक्त, जिला आपूर्ति अधिकारी व जिले के वित्त अधिकारी को शामिल करते हुए एक समिति का गठन किया। समिति ने गत 19 अक्टूबर को बैठक के बाद न्यूनतम तीन रुपये प्रति सिलेंडर की दरें तय कर दी हैं, जिससे कम दर की निविदा को अस्वीकार कर दिया जाएगा। श्री रावत ने कहा कि यह कदम उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधाएं देने तथा गैस की वितरण व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।

19 एजेंसियों के लिए नये सिरे से निविदाएं आमंत्रित

नैनीताल। केएमवीएन ने न्यूनतम व्यावहारिक दरें तय करने के बाद अपनी 29 में से 19 गैस एजेंसियों में होम डिलीवरी के लिए नये सिरे से निविदाएं आमंत्रित कर दी हैं। निगम के जीएम प्रकाश चंद्र ने बताया कि 28 दिसम्बर तक हल्द्वानी, रुद्रपुर, बाजपुर, जसपुर, किच्छा, सल्ट, बागेश्वर, चंपावत, लोहाघाट, देवीधूरा, बेरीनाग, गरुड़, डीडीहाट, मुनस्यारी, भवाली, टनकपुर व धारचूला में होम डिलीवरी के लिए निविदा पत्र लिये जा सकते हैं। इनमें तीन रुपये प्रति सिलेंडर से अधिक दर पर निविदाएं डालनी होंगी। पूर्व में इससे कम दर की निविदाएं आने के कारण रुद्रपुर, किच्छा व बाजपुर में निविदा प्रक्रिया निरस्त कर दी गई थी।

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

"बूढ़े" डाक्टरों के लिए बंद हो जाएंगे स्वास्थ्य महकमे के द्वार


पिछली सरकार के एक और निर्णय को बदलने की तैयारी में सरकार
नवीन जोशी नैनीताल। प्रदेश सरकार पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के एक और निर्णय को बदलने की तैयारी में है। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि सरकार सेवानिवृत्त चिकित्सकों को संविदा पर आगे से नियुक्ति न देने पर विचार कर रही है। उनके मार्च में समाप्त हो रहे अनुबंध तभी बढ़ाए जाएंगे, जब वे अपने आला अधिकारी सीएमएस या सीएमओ से उपयोगिता प्रमाणपत्र पेश करेंगे कि उन्होंने संविदा की अवधि में कितने मरीज देखे और कितने ऑपरेशन या अन्य कार्य किए। प्रदेश में चिकित्सकों की कमी को देखते हुए वर्ष 2001 से ही संविदा पर चिकित्सकों को रखने की व्यवस्था की गई थी, निशंक सरकार के समय इस तरीके को चिकित्सकों की कमी को दूर करने का प्रमुख माध्यम बनाया गया। वर्ष 2011 में एक शासनादेश भी इस बाबत जारी हुआ। हर मंगलवार को स्वास्थ्य विभाग के देहरादून मुख्यालय में संविदा पर एक वर्ष या लोक सेवा आयोग से नियमित नियुक्ति होने तक के लिए तैनात करने के लिए चिकित्सकों के 'वाक इन इंटरव्यू' होने लगे, जो हालांकि अधिकतम 65 वर्ष तक की उम्र के नये या सेवानिवृत्त सभी सामान्य एमबीबीएस व विशेषज्ञ चिकित्सकों के लिए थे, लेकिन सेवानिवृत्त चिकित्सकों ने ही इसका अधिकतम लाभ उठाया। संविदा पर तैनाती दूरस्थ क्षेत्रों में होनी थी, लेकिन बूढ़े-बीमार चिकित्सक शहरी अस्पतालों में तैनात हो गये, जिनकी सेवाओं का लाभ जनता को कम ही मिल पाया। प्रदेशभर में ऐसे एक हजार से अधिक चिकित्सक हैं। हाल में एनआरएचएम के तहत इन चिकित्सकों के लिए शहरी, दुर्गम व अति दुर्गम के वर्ग बनाकर उनके मानदेय में भी खासी बढ़ोतरी कर वेतन 48 हजार से 63 हजार रुपये मासिक तक कर दिया गया। इसके बावजूद योजना नये चिकित्सकों को आकर्षित करने एवं बूढ़े डॉक्टरों को दुर्गम-अति दुर्गम क्षेत्रों के अस्पतालों में भेजने में असफल रही है। 'राष्ट्रीय सहारा' शुरू से इस व्यवस्था की खामियों को प्रमुखता से उजागर करता रहा है। उधर रविवार रात्रि स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि सरकार सेवानिवृत्त चिकित्सकों की संविदा पर तैनाती की व्यवस्था का रिव्यू करने जा रही है।


पीपीपी मोड में नहीं चलेंगी गन्ना मिलें
काबीना मंत्री बोले, प्रदेश सरकार ने 500 करोड़ के कर्ज किये माफ मेडिकल छात्रों की सीधी भर्ती के लिए नियमावली में परिवर्तन होगा
नैनीताल (एसएनबी)। प्रदेश के स्वास्थ्य, विज्ञान एवं गन्ना विकास मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि प्रदेश सरकार गन्ना क्षेत्र में दक्षिण भारत के प्रयोगों को अपनाकर 20 फीट लंबे व मोटे गन्ने उगाने जैसे क्रांतिकारी कार्य करने की राह पर है। इसी कड़ी में बंदी की कगार पर गिनी जा रही छह सहकारी एवं चार निजी क्षेत्र की चीनी मिलों को वापस पटरी पर लाने के लिए इनकी 500 करोड़ रुपये की सरकारी देनदारियां माफ कर दी हैं। साथ ही इन मिलों को सरकार बैंकों के 25 करोड़ रुपये के ऋ णों के लिए गारंटी भी देने जा रही है। उन्होंने प्रदेश में चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए भी प्रयास करने की बात कही। इसमें मेडिकल कालेजों से निकलने वाले छात्रों को लोक सेवा आयोग से इतर सीधी भर्ती करने के लिए नियमावली में परिवर्तन किया जाना भी शामिल है। श्री नेगी ने नगर में आयोजित पत्रकार वार्ता में यह जानकारी देते हुए बताया कि प्रदेश की चीनी मिलें 230 करोड़ Rs के घाटे में चल रही हैं, इसीलिए पहले इन्हें पीपीपी मोड में दिये जाने की कोशिश थी। इसे दरकिनार कर अब सरकार ने इनका 500 करोड़ रुपये का बकाया माफ करने का निर्णय ले लिया है। मिलों पर किसानों का 136 करोड़ रुपये बकाया था, इसे किसानों को दिलवा दिया गया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में जमीन की केवल चार इंच ऊपरी सतह को ही हर वर्ष जुताई कर फसलें बोई जाती हैं, अब सरकार दक्षिण भारत की तरह जमीन की निचली सतह तक खोदकर 20-22 फीट लंबे गन्ने उगाने की प्रविधि शुरू करने जा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार के प्रयासों के वाक इन इंटरव्यू में डॉक्टरों के आने की संख्या बढ़ी है। इस मौके पर विधायक सरिता आर्या, पूर्व सांसद डा. महेंद्र पाल एवं रेडक्रास सोसायटी के विनोद तिवारी, डिप्टी सीएमओ डा. डीएस गब्र्याल व पीएमएस डा. अनिल साह आदि भी मौजूद थे।

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गुरुवार, 29 नवंबर 2012

उत्तराखंड के पूर्व सैनिकों पर पड़ सकती है पोंटी चड्ढा हत्याकांड की मार


घटना के बाद सुरक्षा गार्ड की नौकरी के लिए लाइसेंस लेने की प्रक्रिया आयी जांच के दायरे में

नवीन जोशी, नैनीताल। दिल्ली में लिकर किंग पोंटी चड्ढा और उसके भाई हरदीप चड्ढा की गोलीकांड में हुई मौत की मार उत्तराखंड के सेवानिवृत्त सैनिकों और उन युवाओं पर पद सकती है जो सुरक्षा गार्ड की नौकरी प्राप्त करने के लिए शस्त्र लाइसेंस लेते हैं. पोंटी बंधुओं के हत्याकांड में समस्त गोलियां लाइसेंसी हथियारों से ही चलने और शस्त्र लाइसेंसधारी गार्डों के द्वारा ही चलाने के बाद सरकार गार्डों को लाइसेंस देने में कड़ाई बरत सकती है। इस बाबत सर्वोच्च न्यायलय के संज्ञान लेने और केंद्र सर्कार से आये निर्देशों के बाद उत्तराखंड सरकार ने सभी जिलों को शस्त्रों की जांच के निर्देश जारी कर दिए हैं. जिसके बाद रोजगार के लिए शस्त्र लाइसेंस लेने वाले जांच के दायरे में आने तय हैं, साथ ही आगे सरकार ऐसे लाइसेंस देने की राह में परेशानियां खादी कर सकती है.
यह आम बात है कि नए प्राविधान हमेशा कमजोर तबके के लिए ही परेशानी खड़ी करते हैं. सरकार घरेलू  गैस का व्यवसाइक उपयोग न रोक पाई तो सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या कम कर दी. उसी तरह  पोंटी चड्ढा हत्याकांड के बाद शास्त्र लाइसेंस जारी करने और उनके एनी राज्यों में पंजीकरण करने की प्रक्रिया में खामियां उजागर हुई हैं तो इसकी मार भी गरीब बेरोजगारों पर पड़नी तय मानी जा रही है.
इस मामले में उत्तराखंड का बर्खास्त अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष सुखदेव नामधारी आरोपित हुआ है, इसलिए उत्तराखंड पर मामले का अधिक असर पढ़ना तय है. उत्तराखंड आजादी के आन्दोलन से ही सैनिक बहुत राज्य है. सेना से सेवानिवृत्ति के बाद यहाँ के लोग सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर अपनी आजीविका चलते है.
गौरतलब है कि शस्त्र लाइसेंस दो कारणों-भय आकलन के साथ ही रोजगार के दृष्टिकोण से भी देने का प्रावधान है। सामान्यत: जिला प्रशासन बेरोजगारों को रोजगार देने की भावना से ऐसे लाइसेंस दिखाने में अपेक्षाकृत उदारता बरतते हैं.
लेकिन इधर, मामले में मुख्य आरोपित बताया जा रहा सुखदेव सिंह नामधारी स्वयं एक सुरक्षा गार्ड एजेंसी चलाता था। उसने ही अपनी एजेंसी के माध्यम से पोंटी को सुरक्षा गार्ड मुहैया कराई थी। लिहाजा, प्रदेश एवं केंद्र सरकार के निर्देशों पर शुरू हुई शस्त्र लाइसेंसों की जांच की सर्वाधिक मार ऐसे लोगों पर पड़ने जा रही है, जिन्होंने दूसरे कारण यानी सुरक्षा गार्ड की नौकरी प्राप्त करने के लिए शस्त्र लाइसेंस लिये हैं।

प्रदेश भर में शस्त्र लाइसेंसों पर लटकी है तलवार
नैनीताल (एसएनबी)। नैनीताल समेत प्रदेश के समस्त जिलों में पंजीकृत शस्त्र लाइसेंसों पर निरस्त होने की तलवार लटक गई है। प्रदेश शासन ने सर्वोच्च न्यायालय की पहल और केंद्र सरकार द्वारा मांगे जाने के बाद प्रदेश के सभी जिलों से सभी शस्त्र लाइसेंसों के ब्योरे तलब कर लिए हैं। ऐसे शस्त्र लाइसेंसों पर भी खास नजर रहने वाली है, जो एक ही परिवार के अनेक लोगों व एक व्यक्ति को एक से अधिक लाइसेंस जारी हुए हैं, अथवा दूसरे राज्यों से जारी होने के बाद यहां पंजीकृत हुए हैं। भय आंकलन के साथ ही रोजगार के लिए सुरक्षा गाडरे को देने वाले लाइसेंस भी जांच के घेरे में हैं। गौरतलब है कि विगत दिनों हुए लिकर किंग पोंटी चड्ढा और उसके भाई की हत्या के मामले में सरकार की शस्त्र लाइसेंस देने की प्रक्रिया सर्वाधिक विवादों में आ गई है। दायां हाथ न होने के कारण पोंटी चड्ढा जहां लाइसेंसी शस्त्र धारक था, वहीं हत्याकांड में प्रयुक्त सभी गोलियां लाइसेंस शुदा लोगों द्वारा ही चलाई गई हैं। साफ है कि देश में शस्त्र लाइसेंस देने की प्रक्रिया की खामियां इस हत्याकांड के बाद उजागर हुई हैं। देश की सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस प्रक्रिया पर संज्ञान लिया है, जिसके बाद केंद्र और फिर राज्य सरकारें चेती हैं। यहां उत्तराखंड सरकार ने भी केंद्र सरकार के निर्देशों पर प्रदेश भर में शस्त्र लाइसेंसों की व्यापक स्तर पर जांच शुरू कर दी है। बताया गया है कि शासन ने जिलों से शस्त्र लाइसेंसों के बाबत ब्योरे मांगे हैं कि उनके यहां से कितने शस्त्र लाइसेंस जारी हुए हैं, कितने निरस्त हुए हैं और कितने शस्त्र लाइसेंस ऐसे हैं, जो जारी तो दूसरे राज्यों से हुए हैं, और उन्हें प्रदेश के जिलों में पंजीकृत किया गया है। साथ ही सीमा विस्तार की प्रक्रिया भी पूछी गई है। किसी व्यक्ति को किसी राज्य से जारी शस्त्र लाइसेंसों को उस राज्य की सीमा से लगे दो राज्यों में उन राज्यों के गृह मंत्रालय के अनुमोदन पर तथा और अधिक राज्यों में केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुमोदन से सीमा विस्तार कर अनुमति दे दी जाती है। इसके साथ ही शस्त्र लाइसेंस जारी करने के बाबत केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करने को कहा गया है। डीएम नैनीताल निधिमणि त्रिपाठी ने बताया कि जनपद में 10 हजार शस्त्र लाइसेंस हैं, इन सबकी जांच की जा रही है। शस्त्र लाइसेंस धारकों का सत्यापन कराने की योजना नहीं है। चड्ढा बंधु हत्याकांड के बाद प्रदेश में शुरू हुई समस्त शस्त्र लाइसेंसों की जांच

शनिवार, 17 नवंबर 2012

नैनी सरोवर में लगे 'सुरखाब के पर'



नैनीताल मैं सैलानियों के लिए सीजन 'ऑफ' तो प्रवासी पक्षियों के लिए हुआ 'ऑन'
नैनी झील में आए सुर्खाब पक्षी, साथ ही बार हेडेड गीज का भी हुआ आगमन
नवीन जोशी नैनीताल। जी हां, नैनी सरोवर में सुर्खाब के पर लग गए हैं। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं कि नैनीझील में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला सुर्खाब पक्षी पहुंचा है, और नैनीझील के आसपास उड़ते और तैरते हुए खूब आनंदित हो रहा है। उसके आने से निश्चित ही नैनीझील और कमोबेस प्रवासी पक्षियों को निहारने वाले पक्षी प्रेमी खूब इतरा रहे हैं। नैनीताल में इन दिनों जहां मनुष्य सैलानियों का पर्यटन की भाषा में 'ऑफ सीजन' शुरू होने जा रहा है, वहीं मानो सैलानी पक्षियों का सीजन 'ऑन' होने जा रहा है। इन दिनों यहां नैनी सरोवर में चीन, तिब्बत आदि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला सुर्खाब पक्षी तथा बार हेडेड गीज आदि अनेक प्रवासी पक्षी की प्रजातियां पहुंची हैं। पक्षी विशेषज्ञ एवं अंतरराष्ट्रीय छायाकार अनूप साह के अनुसार इन दिनों उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी होने के कारण वहां की झीलें बर्फ से जम जाती हैं। ऐसे में उन सरोवरों में रहने वाले पक्षी नैनीताल जैसे अपेक्षाकृत गरम स्थानों की ओर आ जाते हैं। यह पक्षी यहां पूरे सर्दियों के मौसम में पहाड़ों और यहां भी सर्दी बढ़ने पर रामनगर के काब्रेट पार्क व नानक सागर, बौर जलाशय आदि में रहते हैं, और मार्च-अप्रैल तक यहां से वापस अपने देश लौट आते हैं। उन्होंने बताया कि नैनीझील में कई प्रकार की बतखें भी पहुंची हैं, जबकि नगर के हल्द्वानी रोड स्थित कूड़ा खड्ड में अफगानिस्तान की ओर से स्टेपी ईगल पक्षी भी बड़ी संख्या में पहुंचे हैं।


सुर्खाब के बारे में कुछ ख़ास बातें....
सुर्खाब मुर्गाबी प्रजाति से है। ये मूलत: लद्दाख, नेपाल एवं तिब्बत से आते है. ये सर्दी में भारत के अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार में भी प्रवास करते हैं। इनकी ब्रीडिंग अवधि अप्रैल से जून माह तक होती है। इनका रंग सुनहरा होता है और अंदर की ओर से इसके पंख हरे व चमकदार होते हैं। ये प्राय: जोड़ा बनाकर रहते है। इन्हें ब्राह्नी डक, रेड शैलडक और चकवा-चकवी भी कहा जाता है, यह प्रायः जोड़े के साथ रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि सुर्खाव जीवन में केवल एक बार ही जोड़ा बनाते है। अगर दोनों में से किसी एक की मृत्यु हो जाए तो दूसरा अकेला ही जीवन व्यतीत करेगा। ब्रीडिंग के समय नर सुर्खाब की गर्दन में एक काला बैंड नजर आता है। ये चट्टानों में और ऊंची मिट्टी के टीलों में अपने घौंसले बनाते है तथा पानी से काफी ऊंचाई पर बनाते है। पानी में पाए जाने वाले भोजन के अलावा खेतों में चने, गेंहू, जो की फसलों से भोजन चुनते हैं। ये अधिकांश समय पानी में तैरते हैं इन दौरान ये कीड़े-मकौडे खाकर अपना पेट भरते है ये छोटी मछलियों का भी शिकर करते हैं।  भारत में इनका प्रवास अक्टूबर माह से मार्च तक माना जाता है। 
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