शनिवार, 21 जनवरी 2012

प्रत्याशी आजमा रहे ‘माउथ पब्लिसिटी’ का फंडा

मोहल्लों-पड़ावों  के दुकानदारों को मिल रहीं प्रत्याशी की बढ़त बताने को गड्डियां                     


नवीन जोशी,  नैनीताल। राम सिंह जी की कालाढूंगी रोड पर एक दुकान है। एक प्रत्याशी उन्हें गड्डी पकड़ा गया है। बोल कर गया है कि वह चाहे उसे वोट दे या न दे, लेकिन उसे दुकान पर आने वाले ग्राहकों के पूछने या चर्चा करने पर कहना है कि वह (गड्डी देने वाला प्रत्याशी) जीत रहा है। राम सिंह जितना पूरे दिन में नहीं कमा पाते, केवल बातें करने के कमा रहे हैं। क्षेत्र में ‘माउथ पब्लिसिटी’ का यह नया फंडा खूब चल रहा है। चुनाव में प्रत्याशी अपनी जीत के लिए हर तरह का हथकंडा अपनाते हैं। प्रबंध गुरु कहते हैं कि किसी भी वस्तु या सेवा की मांग बढ़ाने में ‘माउथ पब्लिसिटी’ सबसे कारगर हथियार साबित होती है। आप नई गाड़ी खरीदने जा रहे हैं, लेकिन आपको गाड़ी के बारे में कोई जानकारी नहीं है, तो किसी न किसी से जरूर पूछेंगे कि कौन सी गाड़ी बेहतर होगी। पहले दो-तीन लोगों ने आपको जो गाड़ी बेहतर बता दी, वह आपके मन मस्तिष्क में बैठ जाएगी और उसे आप खरीद लाएंगे। ऐसे ही यह भी हो सकता है कि किसी गाड़ी के बारे में बुरी ‘फीड बैक’ आये और आप चाहते हुए भी उसे न लें। हमारा देश भावना प्रधान लोगों का देश है, और खासकर राजनीति में भावनाओं के आधार पर ही प्रत्याशियों व पार्टियों की अच्छी-बुरी छवि बना करती है। दो दशक पूर्व गणोश जी के दूध पीने और अभी हाल में लखनऊ में सोते ही बुत में तब्दील होने जैसी अफवाहें माउथ पब्लिसिटी के कारण ही इतनी अधिक चर्चा में रहीं। इसी फंडे पर क्षेत्र की एक पार्टी भी अमल कर रही है। उसके प्रत्याशी पूर्व में भी इस फंडे को आजमा चुके हैं। अब उनकी पार्टी इस चुनाव में भी इस फंडे को आजमा रही है, और बताया जा रहा है कि इस फंडे पर बीते कुछ दिनों में उनकी पार्टी ने ठीक-ठाक बढ़त भी बना ली है। आगे देखने वाली बात यह होगी कि माउथ पब्लिसिटी का यह फंडा यहां के चुनाव परिणामों को किस तरह प्रभावित करता है।
जिसकी पी दारू उसकी बताई हवा
नैनीताल। बाहर से देखने में इस बार के विस चुनाव भले चुनाव आचार संहिता के भय से जितने साफ- सुथरे चल रहे हों, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं है। वहां कच्ची-पक्की दारू खूब बंट रही है, साथ ही बाहर से मुग्रे ले जाने में आयोग की नजर पड़ने के भय से ग्रामीण क्षेत्रों में ही पलने वाले बकरों का मतदाताओं को भोग लगाया जा रहा है। "क्या है रुझान" पूछने पर मतदाता पहले सामने वाले को भांपता है, और फिर उसी के पक्ष में ‘हवा’ होने की बात कहने लगता है।


मजदूर संभाल रहे चुनाव प्रचार की बागडोर
नाम वापसी से अब तक कुमाऊं में 50 करोड़ का कारोबार प्रभावित
गौरव पाण्डेय, हल्द्वानी। चुनावी सरगर्मी के बीच बाजार से मजदूर गायब हो गये हैं। इसके चलते कई कारोबारी गतिविधियां ठप हो गई हैं। नाम वापसी से अब तक कुमाऊं में इससे 50 करोड़ से अधिक का कारोबार प्रभावित होने का अनुमान है। यह स्थिति मतदान के कुछ दिन बाद तक बनी रह सकती है। दरअसल मजदूर प्रत्याशियों के चुनावी अभियान की बागडोर संभाले हुए हैं। एक अनुमान के मुताबिक कुमाऊं में करीब चार लाख मजदूर हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, दिल्ली आदि के साथ ही नेपाली मजदूर भी शामिल हैं, जबकि कई स्थानीय मजदूर हैं। ये मजदूर निर्माण, परिवहन, कैटरिंग, खनन, साज-सज्जा, उद्योग समेत तमाम कारोबारों से जुड़े हैं, लेकिन इन दिनों इनका टोटा है। यह सिलसिला जनवरी से शुरू हुआ था। बाजार से मजदूर लगभग पूरी तरह गायब हो गए हैं। इससे कारोबारियों के साथ ही आम लोगों के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। मजदूर उपलब्ध न होने से तमाम व्यवसाय ठप से हो गए हैं। इससे कारोबार में लगातार गिरावट आ रही है। जानकारों का मानना है कि कुमाऊं में अब तक इससे 50 करोड़ से अधिक का कारोबार प्रभावित हुआ है। सर्वाधिक असर निर्माण क्षेत्र पर पड़ा है। छोटे कारोबारी ज्यादा हलकान हैं। दूसरी ओर मजदूर इन दिनों लोकतंत्र के पर्व में मौज काट रहे हैं। ये विभिन्न राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और निर्दलीय प्रत्याशियों के चुनाव में मशगूल हैं और प्रत्याशियों की गैदरिंग का एक बड़ा आधार बने हुए हैं। इन्हें प्रत्याशियों के जनसंपर्क, चुनावी सभा, दावतों में देखा जा सकता है। कई प्रत्याशियों ने मजदूरों को ठेकेदारों के मार्फत मतदान तक बुक कर लिया है। इससे माह भर कारोबारी गतिविधियों के ठप रहने के आसार बने हुए हैं।

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