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शनिवार, 22 जनवरी 2011

जलवायु परिवर्तन की कहानी बयान करेंगी हिमालयी झीलें


डॉ.कोटलिया के नेतृत्व में उत्तराखंड की झीलों के अध्ययन में जुटे भूगर्भ वैज्ञानिक
झीलों के अध्ययन से भविष्य की जलवायु के बारे में लगाया जा सकेगा अनुमान
देहरादून (एसएनबी)। हिमालयी झीलें हिमालय में जलवायु परिवर्तन की कहानी कहेंगी। वह बताएंगी कि हिमालय खासकर उत्तराखंड में कब जलवायु परिवर्तन की मार झेली और उसका हिमालय पर क्या असर पड़ा। उनके पिछले 10 लाख सालों के अध्ययन के जरिए भविष्य की जलवायु के बारे में भी अनुमान लगाया जा सकेगा । भूगर्भ वैज्ञानिकों का एक दल आजकल उत्तराखंड की झीलों का भूगर्भ वैज्ञानिक अध्ययन कर रहा है। 
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की पैलियो क्लाइमेट चेंजेज इन टेथिस हिमालया परियोजना के तहत अध्ययन झीलों के अध्ययन में भूगर्भ वैज्ञानिकों के दल का नेतृत्व कर रहे डॉ. बीएस कोटलिया का कहना है कि उत्तराखंड की झीलों का भूगर्भ वैज्ञानिक अध्ययन कर यह पता लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड में कब कैसी जलवायु थी। वैसे डॉ. कोटलिया उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की परियोजना के तहत होलोसीन क्लाइमेट चेंजेज इन उत्तराखंड के तहत उत्तराखंड की गुफाओं का अध्ययन कर चुके हैं। हिमालय की झीलों ने 50 हजार, 35 हजार, 21 हजार और 3500 वर्ष पहले हिमालय में चार बार हुई अलग-अलग टैक्टोनिक गतिविधियों के कारण जन्म लिया है। इन भूगर्भीय घटनाओं से लद्दाख तक का क्षेत्र प्रभावित हुआ था और इसे झील निर्माण परिघटना के नाम से जाना जाता है। उनका कहना है कि हालांकि अभी झीलों के तल में जमी मिट्टी की परतों से मिली जानकारी प्राचीन गुफाओं से मिली जानकारी जितनी सटीक नहीं है लेकिन हिमालय की झीले पिछली सदियों में हिमालय में हुए जलवायु पर्वितनों के बारे में काफी जानकारी दे सकती हैं। झीलों में जलवायु परिवर्तन या अन्य वजहों से आस-पास की पहाड़ियों से बहकर आई मिट्टी जमा हो जाती है। इस मिट्टी की परतों के अध्ययन से उस समय की जलवायु के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। मिट्टी में उस वक्त हवा में मौजूद परागकण आदि भी बारिश के साथ झील में समा जाते हैं और मिट्टी के साथ बैठ जाते हैं। यही नहीं उस वक्त की वनस्पतियों के अंश, जानवरों के जीवाश्म भी मिट्टी की परतों में दब जाते हैं, यहां तक कि झील के फट जाने पर भी परागकण झील के तल में बने रहते हैं। उनका कहना है कि हर 1000 वर्ष में झील में 30 सेंटीमीटर मोटी मिट्टी की परत जम जाती है जो उस वक्त की वनस्पति के बारे में संकेत देती है और यह पता चलता है कि उस वक्त उस क्षेत्र में कौन-कौन सी वनस्पतियां उग रहीं थीं। इन तथ्यों की मदद से तब की जलवायु के बारे में पता लगाया जा सकता है और उसमें हुए बदलाव को भी जाना जा सकता है। उनका कहना है कि वह परियोजना के तहत भीमताल, नौकुचियाताल, चंपावत, बागेश्वर और पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी के नचिकेता ताल का अध्ययन कर चुके हैं।
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