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सोमवार, 19 मार्च 2012

अब सहनी होगी ‘अल नीनो’ की गरमी


नवीन जोशी, नैनीताल। अगले कुछ वर्षो के दौरान गरमी की अधिक मार पड़ सक ती है। मौसम वैज्ञानिक का मानना है कि अधिक गरमी की मार अगले तीन से 10 वर्षो तक हो सकती है। इस दौरान मौसम अपेक्षाकृत अधिक गरम रहेगा। बारिश सामान्य से कम होगी तथा सर्दी सामान्य से कम होगी। ऐसा बीते कुछ दशकों से प्रशांत महासागर से उठकर दुनिया भर में मौसमी बवंडर फैलाने वाली ‘अल नीनो’ नाम की गरम लहरों के कारण होने जा रहा है। 
दीर्घकालीन मौसम वैज्ञानिक कुमाऊं विवि में तैनात यूजीसी के प्रो. बीएस कोटलिया ने यह दावा किया है। कोटलिया के अनुसार दुनिया में धरती से अधिक क्षेत्रफल जल राशि यानी समुद्र का है। धरती का तापमान सबसे पहले समुद्र की सतह पर गड़बड़ाता है, समुद्री लहरें गरम व सर्द जल धाराओं को दुनिया भर में फैलाकर भू सतह के तापमान को प्रभावित करती हैं। अब दुनिया भर के वैज्ञानिक मान चुके हैं कि प्रशांत महासागर से उठने वाली गरम जल धाराएं ‘अल नीनो’ व ठंडी जल धाराएं ‘ला नीना’ दुनिया भर के मौसम को प्रभावित करने वाली सर्वाधिक प्रभावी घटक के रूप बन गई हैं। 1960-70 के दशक से इनकी सबसे पहले पहचान हुई थी। ला नीना व अल नीना का तीन से सात वर्ष तक का चक्र होता है। बीते दो तीन वर्ष ला नीना सक्रिय रहा, इस कारण इस दौरान अधिक बारिश व ठंड रही, तथा गरमी अपेक्षाकृत कम रही। प्रो. कोटलिया का दावा है कि ला नीनो का प्रभावी चक्र अब बीत चुका है, और अल नीनो की बारी आने वाली है। इसके प्रभाव में अगले कम से कम तीन वर्ष अपेक्षाकृत गरम हो सकते हैं। अपने इस दावे के पीछे उनका तर्क है कि अल नीनो के मूल स्थान प्रशांत महासागर में लहरें गर्म होने लगी हैं। कोटलिया बताते हैं कि इतिहास में 1870 से 2000 के बीच कई बार सूखे यानी अधिक गरमी कम बारिश के चक्र 10 वर्ष तक लंबे रह चुके हैं, इसलिये इस बार भी गरमी के चक्र के 10 वर्ष तक खिंचने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, माना जा सकता है कि अगले कुछ वर्ष गर्म हो सकते हैं, और इस दौरान कम मानसून के लिये भी तैयार रहना होगा। 
पश्चिमी विक्षोभ से ला नीना प्रभावित 
यह भी पढ़ें 
इस वर्ष के अध्ययन के बाद प्रो. कोटलिया ने पहली बार दावा किया है कि ला नीना लहरें भारत में मानसून के कारण पश्चिमी विशोभ और ‘इंटर ट्रोपिकल कंवरजेंस जोन’ यानी आईटीसीजेड को प्रभावित कर रही हैं। कोटलिया कहते हैं कि सामान्यतया भारत में मानसून गोवा से उठकर पश्चिम बंगाल से देश की भूसतह में प्रवेश करता है, और बिहार में बाढ़ का कारण बनता है, और आगे यूपी, उत्तराखंड व दिल्ली होता हुआ लद्दाख जाकर समाप्त हो जाता है। इसके उलट विगत वर्ष इसने ला नीना के कारण रास्ता बदला और गोवा से सीधे मुंबई और अंबाला में कहर ढाकर आखिर लद्दाख में पहली बार बाढ़ (बादल फटने) के हालात उत्पन्न किये। उन्होंने बताया कि इस वर्ष ला नीना पुन: सामान्य हो गया था, आईटीसीजेड भी अधिक सक्रिय नहीं हो पाया था। इसी कारण बारिश सामान्य हुई पर आईटीसीजेड जहां-जहां से गुजरा मौसम ठंडा कर गया। 
‘सोलर मैक्सिमम’ से भी हो सकती है गरमी 
खगोल विज्ञान और खासकर सूर्य पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने कहा है कि सूर्य की सक्रियता के वर्तमान में चल रहे 24वें चक्र का चरमकाल वर्ष 2012-13 में हो सकता है। स्थानीय एरीज के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाबउद्दीन भी ऐसा मानते हैं। 


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