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शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

अब बाजार में मिलेगी लैब में बनी ’देसी वियाग्रा‘

यारसा गंबू

सेना के जैव ऊर्जा सं स्थान की उपलब्धि, दिल्ली की कंपनी को विपणन की जिम्मेदारी, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में उगने वाली वनस्पति अब प्रयोगशाला में उगेगी
नवीन जोशी, नैनीताल। देसी वियाग्रा कही जाने वाली शक्तिवर्धक औषधि ‘कीड़ा जड़ी’ यानी यारसा गंबू को तलाशने के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रों की खाक नहीं छाननी पड़ेगी। हल्द्वानी स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ बायो एनर्जी रिसर्च (डीआईबीईआर) यानी जैव ऊर्जा संस्थान ने इस औषधि को प्रयोगशाला में तैयार करने का कारनामा कर डाला है। एक-दो माह में दिल्ली की एक कंपनी इसे खुले बाजार में उपलब्ध कराने जा रही है। इससे जहां आमजन और खासकर खिलाड़ी इस औषधि को आसानी से प्राप्त कर पाएंगे वहीं आगे राज्य की आर्थिकी में बड़ा योगदान दे सकने वाले इस खजाने के बाबत शंकाएं भी शुरू हो सकती हैं। 
गौरतलब है कि यारसा गंबू (वानस्पतिक नाम- कार्डिसेप्स साइनेसिस) एक विशेष प्रकार का आधा जंतु एवं आधी वनस्पति है। यह हैपिलस फैब्रिकस नाम के खास कीड़े की इल्लियों (कैटरपिलर्स) को मारकर उस पर पनपता है। बताया जाता है कि प्रदेश के पिथौरागढ़, बागेर, चमोली और उत्तरकाशी जनपदों में स्थित बर्फ से आधे वर्ष ढकी रहने वाली उच्च हिमालयी चोटियों पर यह आधे वर्ष जमीन के नीचे कीड़े के रूप में तथा बर्फ पिघलने पर बुग्यालों में फंगस जैसी वनस्पति के रूप में बमुश्किल ढूंढा जाता है। राज्य में प्रतिबंधित न होने के बावजूद बेहद महंगा (देश में कीमत आठ से 10 लाख रुपये प्रति किग्रातथा चीन, ताइवान व कोरिया आदि के बाजारों में 16 से 20 लाख  रुपये प्रति किग्रा) होने के कारण इसके दोहन में अनेक लोग प्रतिवर्ष आपसी तथा व्यापारिक संघर्ष तथा मौसम की विपरीत परिस्थितियों के कारण जान से हाथ धो बैठते हैं। कई लोग वन अधिनियम के तहत कानूनी कार्रवाई की जद में आ जाते हैं। राज्य में वर्तमान में 150 कुंतल यारसा गंबू का व्यापार बताया जाता है। इस लिहाज से इस पर राज्य की करीब छह से आठ सौ करोड़ रुपये तक की आर्थिकी निर्भर है। चीन में हुए बीते ओलंपिक खेलों के दौरान कई खिलाड़ियों के इस औषधि को शक्तिवर्धक स्टेरायड के रूप में प्रयोग करना प्रकाश में आया। इसकी खासियत यह है कि यह किसी प्रकार के डोप टेस्ट में भी पकड़ में नहीं आता और प्रतिबंधित भी नहीं है। चीन से लगे देशों में यौन उत्तेजक व शक्तिवर्धक दवाओं के रूप में इसका प्रयोग पूर्व से ही होता रहा है। डीआईबीईआर के निदेशक डा. जकवान अहमद ने बताया कि उनके संस्थान ने प्रयोगशाला में ‘लैब कल्चर’ तकनीक से यारसा गंबू के उत्पादन का तरीका खोज निकाला है तथा इस तकनीक को संस्थान के नाम पेटेंट भी कर डाला है। उन्होंने बताया कि यारसा गंबू में शक्तिवर्धक व यौन उत्तेजना बढ़ाने में काडिसेपिन तत्व सर्वप्रमुख भूमिका निभाता है। प्राकृतिक यारसा गंबू में जहां काडिसेपिन तत्व 2.42 पीपीएम (पार्ट पर मालिक्यूल) होता है वहीं प्रयोगशाला में बने यारसा गंबू में यह तत्व 2.02 पीपीएम है। यानी दोनों की गुणवत्ता में अधिक अंतर नहीं है। उन्होंने यह तकनीक दिल्ली की एक कंपनी को हस्तांतरित कर दी है। उम्मीद है कि कंपनी एक से तीन माह के भीतर ‘फूड सप्लीमेंट’ अथवा औषधि के रूप में इसे बाजार में ले आएगी। 


पहाड़ की बूटियों से बनी सफेद दाग की दवा : 
डीआईबीईआर ने यारसा गंबू के साथ सफेद दाग यानी ल्यूकोडर्मा के इलाज की औषधि भी प्रयोगशाला में तैयार कर ली है। निदेशक जकवान अहमद ने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों की एमीमोमस सहित पांच औषधियों के प्रयोग से यह औषधि तैयार कर ली है। इसके अलावा मिर्च से अश्रु गैस बनाने मैं भी सफलता अर्जित कर ली गयी है
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