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सोमवार, 7 मार्च 2011

निजाम तो बदले मगर बेरोजगारों की किस्मत नहीं


दावे और वादों तक ही सीमित रह गए राजनीतिक दल विशेषज्ञ दे रहे स्वरोजगार अपनाने की सलाह
नवीन जोशी, नैनीताल। वर्ष 2000 में जब वर्षो संघर्ष के बाद राज्य बन रहा था, तो हर आंख में चमक थी कि अपने राज्य में हर हाथ को काम मिलेगा। पहाड़ के कम उम्र बच्चों को मैदानी शहरों के ढाबों, घरों में बर्तन धोने जैसे कामों के लिए पढ़ाई-लिखाई छोड़कर भागना नहीं पड़ेगा। कई लोग मैदानों से लगा-लगाया काम छोड़कर घर लौट आए, कि अपनी मेहनत से दूसरों की बजाय अपना घर ही सजाएंगे। राज्य बना, भाजपा की अंतरिम सरकार आई, कांग्रेस ने सत्ता हथियाई, उत्तरांचल से उत्तराखंड नाम बदला, पुन: भाजपा सरकार में लौटी, 10 वर्ष के राज्य में पांच मुख्यमंत्री बदल गए लेकिन सच्चाई है कि व्यवस्थाएं नहीं बदलीं, बेरोजगार-बेरोजगार ही रहे। ख्वाबों की ताबीर जो होनी थी, नहीं हुई। अब सरकार के चार वर्ष पूरे होने के साथ नए चुनाव का अघोषित शंखनाद भी हो गया है। वक्त है जब सत्तारूढ़ दल रोजगार दिलाने के दावे और विपक्ष वादे करेगा। एइसे मैं न क्यों न आंकनों से सच्चाई की पड़ताल कर ली जाए.... 
बातें छोड़ सीधे कुमाऊं के मंडल मुख्यालय जनपद के आंकड़ों पर आते हैं। नवंबर 2000 में राज्य बना, इससे पूर्व के वित्तीय वर्ष यानी एक अप्रैल 1999 से 31 मार्च 2000 के बीच एक वर्ष में 4,862 बेरोजगारों ने जिले के तीन सेवायोजन कार्यालयों में नौकरी के लिए पंजीयन कराया था। इस वर्ष 30 को नौकरी मिली थी जबकि राज्य बनने के दौरान मार्च 2001 में कुल 24,239 लोग बेरोजगारी की लाइन में सक्रिय पंजीकृत बेरोजगार थे। अगले यूपी और तत्कालीन उत्तरांचल के संधि काल के दो वर्षो यानी यूपी की भाजपा और उत्तरांचल की अंतरिम भाजपा सरकार के कार्यकाल में 50 लोगों को नौकरी मिली। राज्य के पहले आम चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता हथियाकर पांच वर्ष राज्य किया और उसके कार्यकाल के अंतिम दौर यानी 31 मार्च 2007 तक पांच वर्षो में 251, 250, 23, 86 व 96 मिलाकर कुल 729 को तथा औसतन प्रति वर्ष 146 लोगों को नौकरी मिल पाई। इसे राज्य बनने के लाभ के रूप में देखा जा सकता है। बेरोजगारों की जो संख्या राज्य बनने के दौरान 25,239 थी, दोगुना होते हुए 50,074 हो गई। जनता ने भाजपा को गद्दी दिलाई और भाजपा ने चार वर्ष में दो बार मुखिया की गद्दी बदल दी लेकिन इन चार वर्षो (31 दिसंबर 2010 तक) में क्रमश: 213, 185, 45 व 81 मिलाकर जिले के केवल 535 यानी औसतन 131 लोगों को ही रोजगार मिल सका है। अब वित्तीय वर्ष के शेष बचे तीन माह में यह औसत को पिछले के बराबर ला पाते हैं तो बड़ी बात होगी। कुल मिलाकर देखें तो राज्य बनने के बाद जिले के महज 1255 यानी औसतन प्रति वर्ष 126 बेरोजगारों को ही काम मिला है, और सक्रिय पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या 55,232 तक जा चढ़ी है। यानी राज्य बनने के बाद बेरोजगार दोगुने से भी अधिक हो गये हैं। साथ ही साफ कर दें कि यह आंकड़े सरकारी नौकरियों के ही नहीं हैं, वरन इनमें सिडकुल की फैक्टरियों में लगे लोगों की संख्या भी है, और सभी आंकड़े शिक्षित बेरोजगारों के हैं, क्योंकि सेवायोजन कार्यालय अशिक्षितों का पंजीकरण नहीं करता है।
सेवायोजन आफिस की उपयोगिता पर सवाल
नैनीताल। कोई विभाग यदि अपना ही काम न करे तथा अन्य विभाग उसका कार्य करें तो ऐसे कार्यालय की उपादेयता पर सवाल उठने लाजमी हैं। जिला सेवायोजन कार्यालय का एक कर्मचारी नाम न छापने की शर्त पर कहता है कि विभाग को अन्य विभागों की नियुक्तियां विज्ञापित करने तो दूर उनसे नियुक्तियों संबंधी जानकारियां लेने का 'अधिकार' ही नहीं है। विभाग में स्वयं दर्जनों पद रिक्त हैं, वह अपने यहां ही नियुक्तियां नहीं कर सकता। विभाग बेरोजगारों को रोजगार सृजन के प्रति जानकारियां नहीं दे पा रहा है, ऐसे में विभाग को चलाने की आवश्यकता ही क्या है।

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