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शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

तिब्बती शरणार्थियों को लेकर पसोपे


नैनीताल (एसएनबी)। करमापा मामले की प्रतिक्रिया में सरोवरनगरी में प्रशासन से तिब्बती शरणार्थियों के बाबत पूछी गई जानकारी और नगर पालिका में सूचना अधिकार के तहत उनके भूमि खरीदने संबंधी मामलों की जांच अभी बेहद प्रारंभिक चरण में है। प्रशासन मामले को लेकर पशोपेश में है। इससे इतर नगर में रहने वाले तिब्बती शरणार्थी आरोपों से निश्ंिचत नजर आ रहे हैं। 
उल्लेखनीय है कि नगर में 44 परिवारों के पास वर्षो से अस्थाई राशन कार्ड मौजूद हैं, जिन्हें हर वर्ष नवीनीकृत करना होता है। यह कार्ड शुरू में कैसे बने, इस बाबत विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों को भी कोई जानकारी नहीं है। दूसरे कहा जा रहा है कि राशन कार्ड नागरिकता का नहीं वरन स्थाई रूप से रहने का प्रमाण पत्र होता है। नगर में आधा दर्जन से अधिक नेपाली नागरिकों के भी राशन कार्ड पूर्व से ही बने हुए हैं। दूसरी ओर पालिका के अधिकारियों का कहना है कि भूमि की खरीद-फरोख्त में शासन से निर्धारित स्टांप शुल्क व औपचारिक दस्तावेज देने वालों की रजिस्ट्री की जाती है। भूमिधरों की नागरिकता पर पालिका कोई जवाब नहीं दे सकती। वहीं तिब्बती शरणार्थी संगठन के अध्यक्ष पेमा गेकिल शिथर का कहना है कि राजधानी देहरादून में तो उनके समुदाय के क्षेत्रों में राशन की दुकानें व गैस की एजेंसियां भी उनके ही समुदाय के लोगों की हैं। तिब्बती युवा कांग्रेस के पूर्व सचिव येशी थुप्तेन व वर्तमान पीआरओ तेंजिंग जिंग्मो का कानूनी प्राविधानों का हवाला देते हुए कहना है कि आरोप् विरोधियों की साजिश हो सकते हैं। पूर्व में भी जांच हो चुकी हैं। कहीं कुछ भी गलत नहीं है। सरकार ने ही उन्हें दुकानें व भूमि आवंटित की है।
क्या है प्रावधान
नैनीताल। देश में 28 नवम्बर 1986 को प्रस्तावित किये गए नागरिकता संशोधन अधिनियम 1986 के अनुसार देश के संविधान के लागू होने की तिथि यानी 26 जनवरी 1950 से इस अधिनियम के लागू होने की तिथि एक जुलाई 1987 के बीच भारत में पैदा हुए तिब्बती शरणार्थी स्वत: ही देश के नागरिक हैं। इसके साथ ही इस अवधि में पैदा हुए माता-पिता की संतानें भी स्वत: देश की नागरिक होती हैं। इस अवधि से पूर्व व बाद में पैदा हुए हुए लोग देश के नागरिक नहीं हो सकते।



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